जैसलमेर किले के भाटी राजपूतों
भाटी अथवा "भट्टी" भारत और पाकिस्तान के राजपूत कबीले है. भाटी राजपूत (जिसे बरगला भी कहा जाता है) चंद्रवंशी मूल के होने का दावा करता है।
भाटी कबीले द्वारा कभी-कभी अपने पुराने नाम "यादवपती", जो कृष्ण और यदु या यादव से उनके वंश को दर्शाते थे,का भी प्रयोग किया जाता है।
12 वीं सदी में भाटी राजपूत ने जैसलमेर पर शासन किया। ये लोग ऊंट सवार, योद्धाओं और मवेशी चोरी और शिकार के शौकीन थे। रेगिस्तान में गहरे स्थित होने के कारण, जैसलमेर भारत में मुस्लिम विस्तार के दौरान सीधे मुस्लिम आक्रमण से बच गया था लेकिन
कुछ भाटी खानाबदोश मवेशी रखने वाले थे। 1857 के विद्रोह से पहले के कुछ वर्षों में, इन समूहों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा किए गए फैसलों के कारण अपनी जमीन खो दी थी, जो कि जाट किसानों को चराई वाले भूमि को पूर्व में दिल्ली और हरियाणा क्षेत्रों में भाटियों द्वारा आवृत करती थी।
राजस्थान के भाटी राजपूत में से कुछ ,उन समुदायों में शामिल थे जो 1883-1998 के बीच यह भारत।
भाटी गुर्जर प्रत पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में, खासकर उत्तरी और मध्य पंजाब में, निम्न जाति के डोम (या मिरासी गायक / नर्तक) अब भी खुद को 'भट्टी ' कहते हैं।
भाटी गोत्र गुर्जर प्रतिहारों का ही हिस्सा है जो गुर्जरों में से ही राजपूत बने,अभी भी गुर्जर भाटी भारत और पाकिस्तान में भारी संख्या में मौजूद है,गौतमबुद्ध नगर भाटियों का राज्य था,जिसका नाम भटनेर था यहाँ के राजा उमराव सिंह भाटी थे जो 1857 की क्रांति में शहीद हुए, भाटी गोत्र के 360 गांव जो कि गुर्जर है, गुर्जर भाटियों जिक्र सतयुग में भी राजा नल के समय में है।
भाटियो का राव वंश वेलियो, सोरम घाट, आत्रेस गोत्र, मारधनी साखा, सामवेद, गुरु प्रोहित, माग्न्यार डगा, रतनु चारण तीन परवर, अरनियो, अपबनो, अगोतरो, मथुरा क्षेत्र, द्वारका कुल क्षेत्र, कदम वृक्ष, भेरव ढोल, गनादि गुणेश, भगवां निशान, भगवी गादी, भगवी जाजम, भगवा तम्बू, मृगराज, सर घोड़ों अगनजीत खांडो, अगनजीत नगारों, यमुना नदी, गोरो भेरू, पक्षी गरुड़, पुष्पकर्णा पुरोहित, कुलदेवी स्वांगीयाजी, अवतार श्री कृष्णा, छत्र मेघाडंबर, गुरु दुर्वासा रतननाथ, विरूप उतर भड किवाड़, छ्त्राला यादव, अभिवादन जय श्री कृष्णा, व्रत एकादशी।
उत्तर भड़ किंवाड़
काक नदी की पतली धारा किनारों से विरक्त सी होकर धीरे धीरे सरक रही थी | आसमान ऊपर चुपचाप पहरा दे रहा था और नीचे लुद्रवा देश की धरती, जिसे आजकल जैसलमेर कहा जाता है, प्रभात काल में खूंटी तानकर सो रही थी | नदी के किनारे से कुछ दूरी पर लुद्रवे का प्राचीन दुर्ग गुमसुम सा खड़ा रावल देवराज का नाम स्मरण कर रहा था | ‘कैसा पराक्रमी वीर था ! अकेला होकर जिसने बाप का बैर लिया | पंवारों की धार पर आक्रमण कर आया और यहाँ युक्ति, साहस और शौर्य से मुझ पर भी अधिकार कर लिया | साहसी अकेला भी हुआ तो क्या हुआ ? हाँ ! अकेला भी अथक परिश्रम ,साहस और सत्य निष्ठा से संसार को अपने वश में कर लेता है ….|
उसका विचार -प्रवाह टूट गया | वृद्ध राजमाता रावल भोजदेव को पूछ रही है –
‘ बेटा गजनी के बादशाह की फौजे अब कितनी दूर होंगी ?’
‘ यहाँ से कोस भर दूर मेढ़ों के माल में |’
‘ और तू चुपचाप बैठा है ?’
‘ तो क्या करूँ ? मैंने बादशाह को वायदा किया कि उसके आक्रमण की खबर आबू नहीं पहुंचाउंगा और बदले में बादशाह ने भी वायदा किया है कि वह लुद्रवे की धरती पर लूटमार अथवा आक्रमण नहीं करेगा |’
राजमाता पंवार जी अपने १५-१६ वर्षीय इकलौते पुत्र को हतप्रद सी होकर एकटक देखने लगी, जैसे उसकी दृष्टि पूछ रही थी ‘ क्या तुम विजयराज लांजा के पुत्र हो ? क्या तुमने मेरा दूध पिया है ? क्या तुम्ही ने इस छोटी अवस्था में पचास लड़ाइयाँ जीती है ? ‘ नहीं ! या तो सत्य झुंट हो गया या फिर झुंट सत्य का अभिनय कर रहा था |
परन्तु राजमाता की दृष्टि इतने प्रश्नों को टटोलने के बाद अपने पुत्र भोजदेव से लौट कर अपने वैधव्य पर आकर अटक गयी | लुद्रवे का भाग्य पलट गया है अन्यथा मुझे वैधव्य क्यों देखना पड़ता ? क्या मै सती होने से इसलिए रोकी गई कि इस पुत्र को प्रसव करूँ | काश ! आज वे होते |’ सोचते-सोचते राजमाता पंवार जी के दुर्भाग्य से हरे हुए साहस ने निराश होकर एक निश्वास डाल दिया |
क्यों माँ, तुम चुप क्यों हो ? क्या मेरी संधि तुम्हे पसंद नहीं आई ? मैंने लुद्रवे को लुट से बचा लिया , हजारों देश वासियों की जान बच गई |’
‘आज तक तो बेटा , आन और बात के लिए जान देना पसंद करना पड़ता था | तुम्हारे पिताजी को यह पसंद था इसलिए मुझे भी पसंद करना पड़ता था और अब वचन चलें जाय पर प्राण नहीं जाय यह बात तुमने पसंद की है इसलिए तुम्हारी माँ होने के कारण मुझे भी यह पसंद करना पड़ेगा | हम स्त्रियों को तो कोई जहाँ रखे, खुश होकर रहना ही पड़ता है |’
आगे राजमाता कुछ कहना ही चाहती थी किन्तु भोजराज ने बाधा देकर पूछा – ” किसकी बात और किसकी आन जा रही है | मुझे कुछ भी मालूम नहीं है | कुछ बताओ तो सही माँ ! ”
‘बेटा ! जब तुम्हारे पिता रावलजी मेरा पाणिग्रहण करने आबू गए थे तब मेरी माँ ने उनके ललाट पर दही का तिलक लगाते हुए कहा था – ” जवांई राजा , आप तो उत्तर के भड़ किंवाड़ भाटी रहना |” तब तुम्हारे पिता ने यह बात स्वीकारी थी | आज तुम्हारे पिता की चिता जलकर शांत ही नहीं हुई कि उसकी उसकी राख को कुचलता हुआ बादशाह उसी आबू पर आक्रमण करने जा रहा है और उत्तर का भड़-किंवाड़ चरमरा कर टुटा नहीं, प्राण बचाने की राजनीती में छला जाकर अपने आप खुल गया | इसी दरवाजे से निकलती हुई फौजे अब आबू पर आक्रमण करेंगी तब मेरी माँ सोचेगी कि मेरे जवांई को १०० वर्ष तो पहले ही पहुँच गए पर मेरा छोटा सा मासूम दोहिता भी इस विशाल सेना से युद्ध करता हुआ काम आया होगा वरना किसकी मजाल है जो भाटियों के रहते इस दिशा से चढ़कर आ जावे | परन्तु जब तुम्हारा विवाह होगा और आबू में निमंत्रण के पीले चावल पहुंचेंगे, तब उन्हें कितना आश्चर्य होगा कि हमारा दोहिता तो अभी जिन्दा है |”
बस बंद करो माँ ! यह पहले ही कह दिया होता कि पिताजी ने ऐसा वचन दिया है | पर कोई बात नहीं, भोजदेव प्राण देकर भी अपनी भूल सुधारने की क्षमता रखता है | पिता का वचन मै हर कीमत चुका कर पूरा करूँगा |” ” नहीं बेटा ! तुम्हारे पिता ने तो मेरी माता को वचन दिया था परन्तु इस धरती से तुम्हारा जन्म हुआ है और तुम्हारा जन्म ही उसकी आन रखने का वचन है | इस नीलाकाश के नीचे तुम बड़े हुए हो और तुम्हारा बड़ा होना ही इस गगन से स्वतंत्र्य और स्वच्छ वायु बहाने का वचन है | तुमने इस सिंहासन पर बैठकर राज्य सुख और वैभव का भोग भोग है और यह सिंहासन ही इस देश की आजादी का, इस देश की शान का, इस देश की स्त्रियों के सुहाग ,सम्मान और सतीत्व की सुरक्षा का जीता जागता जवलंत वचन है | क्या तुम ……………………|
‘क्षम करो माँ ! मैं शर्मिंदा हूँ | शत्रु समीप है | तूफानों से अड़ने के लिए मुझे स्वस्थ रहने दो | मैं भोला हूँ – भूल गया पर इस जिन्दगी को विधाता की भूल नहीं बनाना चाहता |’
झन न न न !
रावल भोजदेव ने घंटा बजाकर अपने चाचा जैसल को बुलाया |
‘चाचा जी ! समय कम है | रणक्षेत्र के लुए में जिन्दगी और वर्चस्व की बाजी लगानी पड़ेगी | आप बादशाह से मिल जाईये और मैं आक्रमण करता हूँ | कमजोर शत्रु पर अवसर पाकर आघात कर , हो सके तो लुद्रवा का पाट छीन लें अन्यथा बादशाह से मेरा तो बैर ले ही लेंगे |
जैसल ने इंकार किया, युक्तियाँ भी दी, किन्तु भतीजे की युक्ति, साहस और प्रत्युत्पन्न मति के सामने हथियार डाल दिए | इधर जैसल ने बादशाह को भोजदेव के आक्रमण का भेद दिया और उधर कुछ ही दुरी पर लुद्रवे का नक्कारा सुनाई दिया |
मुसलमानों ने देखा १५ वर्ष का का एक छोटा सा बालक बरसात की घटा की तरह चारों और छा गया है | मदमत्त और उन्मुक्त -सा होकर वह तलवार चला रहा था और उसके आगे नर मुंड दौड़ रहे थे | सोई हुई धरती जाग उठी, काक नदी की सुखी हुई धारा सजल हो गई, गम सुम खड़े दुर्ग ने आँखे फाड़ फाड़ कर देखा – उमड़ता हुआ साकार यौवन अधखिले हुए अरमानों को मसलता हुआ जा रहा है | देवराज और विजयराज की आत्माओं ने अंगडाई लेकर उठते हुए देखा – इतिहास की धरती पर मिटते हुए उनके चरण चिन्ह एक बार फिर उभर उभर आए है और उनके मुंह से बरबस निकल पड़ा – वाह रे भोज, वाह !
दो दिन घडी चढ़ते चढ़ते बादशाह की पन्द्रह हजार फ़ौज में त्राहि त्राहि मच गई | उस त्राहि त्राहि के बीच रणक्षेत्र में भोजदेव का बिना सिर का शरीर लड़ते लड़ते थक कर सो गया – देश का एक कर्तव्य निष्ठ सतर्क प्रहरी सदा के लिए सो गया | भोजदेव सो गया, उसकी उठती हुई जवानी के उमड़ते हुए अरमान सो गए, उसकी वह शानदार जिन्दगी सो गई किन्तु आन नहीं सोई | वह अब भी जाग रही है |
जैसल ने भी कर्तव्य की शेष कृति को पूरा किया | बादशाह को धोखा हुआ | उसने दुतरफी और करारी मात खाई| आबू लुटने के उसके अरमान धूल धूसरित हो गए | सजधज कर दुबारा तैयारी के साथ आकर जैसल से बदला लेने के लिए वह अपने देश लौट पड़ा और जैसल ने भी उसके स्वागत के लिए एक नए और सुद्रढ़ दुर्ग को खड़ा कर दिया जिसका नाम दिया – जैसलमेर ! इस दुर्ग को याद है कि इस पर और कई लोग चढ़कर आये है पर वह कभी लौटकर नहीं आया जिसे जैसल और भोजदेव ने हराया | आज भी यह दुर्ग खड़ा हुआ मन ही मन ” उत्तर भड़ किंवाड़ भाटी ” के मन्त्र का जाप कर रहा है |
HISTORY OF YADUVANSHI "BHATI RAJPUT"
Jaisalmer State
Maharaj Bhim Singh- Jaisalmer
Maharaval Shalivahan-1891 Jaisalmer
जैसलमेर के यदुवंशी भाटी राजपूतों का इतिहास, राज्य का राज चिन्ह ,ध्वज ,मेघाडम्बर छत्र तथा कुलदेवी सांगियाजी
जैसलमेर का राजवंश राजपूतों की चंद्रवंश की यदुवंशी/पौराणिक यादव/जादौन खांप की भाटी शाखा में है और अपने पूर्वज राजा भाटी के नाम से "भाटी "या भाटी यादव" कहलाता है। इनके मूल पुरुष पंजाब से चल कर वि0 सं 0 800 के करीब राजपूताने में अधिकार किया था। इन भाटियों ने समय - समय पर उत्तर से भारत पर आक्रमण करने वालों का सब से प्रथम मुकाबला किया था। इसी से इनको "उत्तर भड़ किवाड़ भाटी " अर्थात उत्तर भारत के द्वार रक्षक भाटी" कहते है। यहां के नरेश पंजाब से राजपूताने में आने के कारण अपने को "पश्चिम के बादशाह" भी कहते है। यादव वंश महाराजा ययाति के पुत्र यदु के नाम से प्रसिद्ध हुआ है। इन यादवों का शासन भारतवर्ष के एक बड़े भाग पर रहा है। भगवान् श्री कृष्ण के बाद उनके कुछ वंशधर हिन्दुकुश के उत्तर में व् सिंधु नदी के दक्षिण भाग और पंजाब में बस गए थे और वह स्थान "यदु की डाँग" कहलाया। यदु की डाँग से जबुलिस्तान, गजनी, सम्बलपुर होते हुऐ सिंध के रेगिस्तान में आये और वहां से लंघा, जामडा और मोहिल कौमो को निकाल कर तनौट, देरावल, लोद्र्वा और जैसलमेर को अपनी राजधानी बनाई। जैसलमेर के इस राजवंश का इतिहास यथाक्रम महाराजा रज से प्रारम्भ होता है जो वि0 सं0 600 के आस-पास हुआ था।इनका पुत्र गज था और उसका राज्य पेशावर (पुरुषपुर) के आस-पास था। इसका नाम गजपति भी था। इसने गजनी या गजनीपुर नाम का नगर बसाया था। इसी को अफगानिस्तान का गजनी शहर कहते है। गंधार देश जिसको अब कंधार कहते है, प्राचीन समय में चंद्रवंशी क्षत्रियों के अधिकार में था और चीनी यात्री हुएनसांग सातवीं शताव्दी में उस तरफ से होकर ही भारत में आया था। उसने उस समय हिरात से कंधार तक हिन्दू राजा व् प्रजा का होना लिखा है। खुराशान् के बादशाह ने महाराज गज पर चढाई की इस युद्ध में खुराशानी बादशाह और महाराज गजदोनों हीकाम आये और राजधानी गजनी पर मलेच्छों (मुसलमानों) का अधिकार हो गया।जब गाजीपुर मुगलों के हाथ चला गया तोमहाराज गज के पुत्र शालिवाहन पंजाब के दक्षिण की ओर अपने साथिओं के साथ बढे और वर्तमान लाहोर के पास शालवाहनपुर नगर बसाया। यह नगर वही है जिसे अब शियालकोट कहते है। धीरे-धीरे ये पंजाब के स्वामी होगये।शालिवाहन के बाद उसका बड़ा पुत्र बलंद शालभानपुर (शियालकोट) की गद्दी पर बैठा। इसके समय में तुर्कों का जोर बहुत बढ़ गया था और उन्होंने गजनी पुर बापिस ले लिया। इससे बलंद के पुत्रों के अधिकार मेंकेवल सिंधु नदी का पश्चिमी भाग ही रहा।बलन्द के 6 पुत्रों में ज्येष्ठ भाटी थे। ये बड़े प्रतापी योद्धा थे। इन्होंने कई लड़ाईयां लड़ीं थी। महाराज भाटी जी के समय तक इस वंश का नाम "यादव वंश" ही था। परन्तु इस प्रतापी राजा के पीछे उनके वंशज "भाटी" नाम से प्रसिद्ध हुए। इन्होंने अपने नाम से भट्टिक संवत् भी चलाया था जो पंजाब में अर्से तक चलता रहा। महाराज भाटी जी का समय वि0 सं0 680 (ई0 सन् 623) के करीब होता है जब वे गद्दी नशीन हुए होंगे। महाराज भाटी जी ने अपने नाम पर पंजाब में भटनेर नाम का प्रसिद्ध गढ़ व् नगर बसाया जो बहुत समय तक भाटियों के अधिकार में रहा और फिर भाटी मुसलमानों के हाथ लगा। बाद में सन् 1805 में मुसलमान जाब्तखां भट्टी से वह बीकानेर के राठौड़ों के राज्य में सम्मिलित हो गया। अब उसका नाम "हनुमानगढ़" है।
इस भाटी राजवंश का इतिहास डावांडोल रहा है। इन्होंने भिन्न -भिन्न समयों में भिन्न-भिन्न स्थानों पर अपना प्रभुत्व जमाया था।ये अपनी 9 राजधानीयो में से जैसलमेर को अंतिम राजधानी बतलाते है और 12 जुलाई सन् 1155 को इसका स्थापित होना मानते है। इस विषय का एक पद्य भी है
मथुरा काशी प्राग बड़,गजनी अरु भटनेर।
दिगम् दिरावल लोद्रवो,नमो जैसलमेर।।
जैसलमेर को महारावल जैसलदेव ने अपनी राजधानी बनाया था। वे सिर्फ 12 वर्ष जीवित रहे और फिर संसार से चल बसे। इसके बाद जैसलमेर के राज्य में काफी उतार-चढाव आये लेकिन अंत तक भाटी राजपुत संघर्ष रत रहे और पुनः जैसलमेर पर उनका ही आधपट्टिय रहा। संक्षिप्त में भाटियों का वंश -चंद्र, कुल -यदु, कुलदेवता -लक्ष्मीनाथ, कुलदेवी -सांगियाजी, देवी -भाद्रयाजी, इष्ट देव -श्री कृष्ण, गोत्र -अत्रि, दुर्ग-जैसलमेर, पूगल, बीकमपुर, बरसलपुर, मारोठ, केहरोड, देरावर, बींझनोत, लुद्रवा, भटनेर, मुमनबाहन, दुनियापुर, भटिंडा।
अधिकांश इतिहासकारों ने करौली के यादवों और जैसलमेर के भाटियों के लिए भी जादौन या जादव 'जदुवंशी,शब्दों का प्रयोग किया है। इन दोनों को ही वज्रनाभ जी के वंशज माना है|
मेघाडम्बर छत्र का इतिहास
मेघाडम्बर छत्र का इतिहास ---रुक्मणी जी के स्वयंवर में जब भगवान् श्री कृष्ण का पद के अनुरूप राज्योचित शिष्टाचार से विदर्भ प्रदेश के कुण्डनपुर के राजा भीष्मक केद्वारा स्वागत नहीं किये जाने के विरोध में श्री कृष्ण जी ने अपना डेरा क्रथकैथ उद्ध्यान में रखा। राजा भीष्मक द्वारा श्री कृष्ण जी की उदासीन अगवानी से देवराज इंद्र भी प्रसन्न नहीं थे। उन्होंने श्री कृष्ण जी को सांत्वंना देने के लिए स्वर्ग से स्वयं का नृपयोग्य तामझाम क्रथ कैथ उद्यान भेजा, जिसमें शासकीय "मेघाडम्बर छत्र " भी था। यह सब जानकर राजा भीष्मक को अपनी भूल का ध्यान आया, संकोच से भरे राजा ने क्रथ कैथ उद्यान में ही श्री कृष्ण के लिए सम्राटों के पद के अनुरूप भव्य स्वागत समारोह का आयोजन किया। इस दरबार में उन्हें नजरें भेंट की गई। सभी आगंतुकों ने स्वयं उपस्थित होकर भगवान् श्री कृष्ण को राजकीय सम्मान से उपहार दिए और उनके प्रति श्रद्धा दर्शयी। रुक्मणी जी ने स्वयंबर में श्री कृष्ण जी को वर चुना .बाकी सब राजा निराश होकर अपने अपने राज्य को चले गये। स्वयंवर की समाप्ति पर देवराज इन्द्र का सारा तामझाम स्वर्ग लौटा दिया गया, किन्तु श्री कृष्ण जी ने शासकीय "मेघाडम्बर छत्र" अपने लिए पीछे रोक लिया और इसे अपना राजकीय अधिकार -चिन्ह बनाकर घोषणा की कि जब तक "मेघाडम्बर छत्र "यदुवंशियों के साथ रहेगा वह धरती पर राज करते रहेंगे। यह छत्र अब भी भाटियों के जैशलमेर राजघराने में है और भाटी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भाटियों के उस क्षेत्र में राज कर रहे है।यदुवंशियों का विरुद्र "छत्राला यदुवंशी" होने से सभी शासकीय जातियों में यह वरिष्ठतम शासक है।
भाटियों की कुल देवी सांगियाजी का इतिहास
भाटियों की कुल देवी सांगियाजी का इतिहास ----महाभारत युद्ध के समय तक सोमवंशी/चंद्रवंशी यदु जाति की कुलदेवी भगवती कालिका देवी थीं, जिन्हें साहणों देवी भी कहा जाता था; बाद में वह "सांगियाजी" कहलायी। श्री कृष्ण के प्रति मगध नरेश जरासंध के अपमानकारी वर्ताव को देवी कालिका सहन नहीं कर सकी, इस लिए श्री कृष्ण की सहमति से क्रुद्ध देवी ने भरे दरबार में राजा जरासंध से झपटा मारकर उसका दिव्य साँग (भाला) छीन लिया। यह आवश्यक था, क्यों कि जरासंध को वरदान था कि जब तक साँग उनके पास रहेगा वह अभेद्य रहेंगे।इस छीना-झपटी में साँग का अग्रभाग कुछ मुड़ गया इसी लिए भाटियों के राजचिन्ह में भाले की नोक मुड़ी हुई दिखाई गई है। श्री कृष्ण को देवी ने साँग भेंट किया और उसके बाद भीम ने साँग रहित राजाजरासंध का वध कर दिया। चूँकि कुल देवी कालिका ने राजा जरासंध से "साँग" छीन कर लिया था इस लिए इन्हें "साँग –ग्रहयानि" या "साँगिया" जी कहा जाता है। इस घटना के बाद यदुवंशियों की कुलदेवी को सांगियाजी के नाम से संबोधित किया जाने लगा।
जैसलमेर के यदुवंशी भाटी राजपूतों का राजचिन्ह व् ध्वज (Coat of Arms )
जैसलमेर राज्य के यदुवंशी/पौराणिक यादव राजपूतों के राजचिन्ह में एक ढाल है, जिस पर खंजन चिड़िया (सुगन चिडी,पलंब) बैठी है।ढाल के दोनों तरफ एक-एक हिरन चित्रित है। ढाल के बीच में किले की एक बुर्ज है और एक बलिष्ठ पुरुष की नंगी भुजा में एक तरफ से टूटा हुआ भाला आक्रमण करते हुये दिखाया गया है। यह राज्य चिन्ह किसी संन्यासी का बताया हुआ कहा जाता है और यह दरबार के झंडे पर ही लगा रहता है। यहां का शाही झंडा भगवा रंग का है क्यों कि कनफते योगी रतन नाथ, रावल देवराज का गुरु था और उसने अपने शिष्य को कई प्रकार से लाभ पहुंचाया। कुछ इतिहासकार कहते है कि यह राजचिन्ह जोगी रतननाथ द्वारा प्रदान किया गया था और दरबार के भगवे रंग के झंडे पर लगा रहता है।
ढाल का रंग नारंगी है, लेकिन उस पर किले की बुर्ज जो काले रंग की है वे जैसलमेर किले को सूचित करती है और इस राज्य चिन्ह पर भाले के निशान् से इस वंश की कुल देवी स्वांगीयाजी सूचित होती है।भाले का निशांन, कुलदेवी सांगियाजी की मगध के राजा जरासंध पर विजय का सूचक है। सांगियाजी का अर्थ है, स्वांगी अर्थात भाला या सांग रखने वाली या ग्रहण करने वाली। कहते हैकि श्री कृष्ण के समय में मगध नरेश जरासन्धके पास यह भाला था जो उसे देवताओं से प्राप्त हुआ था और जिसका प्रभाव था कि जब तक यह भाला उनके पास होता, तब तक वह अजेय थे और कोई भी इस भाले के बार से नहीं बच सकता था। जिस किसी की ओर यह भाला लगाया जाता वह निश्चित मर जाता। श्री कृष्ण जी ने कालिका देवी से प्रार्थना करके यह भाला राजा जरासंध से छिन वाया। देवी ने राजा जरासंध से युद्ध करके यादवों के लिए यह भाला छीन लिया। उसकी छीना-झपटी में भाले काएक सिरा टूट गया, इसी लिए राज्य चिन्ह में टूटा हुआ भाला दर्शाया गया है।
खंजन पक्षी, जिसे सुगन चिड़ी भी कहते है, देवी सांगियाजी की प्रतीक है। कहते है कि ये खंजन पक्षी महारावल बिजैराज के सिर पर आ बैठी थी। वास्तव में ये पक्षी न था इनकी कुलदेवी स्वागिया देवी थी। कुछ तथ्य ये भी बताते है कि देवी के वरदान से यह चिड़िया महारावल बिजेराव "चुडाला" के घोड़े की कन्नौती के बीच में बैठती थी और अपनी अद्रश्य तलवारों से युद्ध में उनका साथ देती थी।इससे रावल की जीत रही।
राज्य चिन्ह में ढाल केनीचे "छत्राला यादवपति" लिखा हुआ है और उस ढाल के नीचे "उत्तर भड़ किवाड़ भाटी" अंकित है जिसका अर्थ यह है कि "भाटी उत्तर भारत के द्वार रक्षक है" अर्थात इन्होंने समय-समय पर भारत पर उत्तर से आक्रमण करने वालों का सबसे पहले मुकाबला किया है। यहां के नरेश पंजाब से राजपूताने में आने के कारण अपने को "पश्चिम के बादशाह" भी कहते है।
जब कुण्डलपुर के राजा भीष्मक की राजकुमारी रुक्मणी जी के स्वयंवर में श्री कृष्ण जी गये हुए थे, तब देवराज इंद्र ने उनके लिए स्वर्ग से लवाजमा भेजा था, जिसमें "मेघाडम्बर छत्र भी था। स्वयंमवर के बाद उन्होंने सारा लवाजमा तो स्वर्ग लौटा दिया, किन्तु मेघाडम्बर छत्र नहीं लौटाया। इसे अपने और अपने यदुवंशी वंशजों के लिए प्रतीक स्वरूप रख लिया। इस छत्र के कारण यदुवंशी, छत्राला" कहलाये। राजतिलक के समय जैसलमेर के नरेश सोने-चांदी के छत्र चारणों को दान में देते है। जैसलमेर के भाटी यादवों में पद में सबसे वरिष्ठ होने के कारण, "यादवपति" कहलाते है। इस लिए "छत्राला यादवपति" की उपाधि से सम्मानित है। महारावल बिजयराव लाँझा के अन्हिलवाड़ पाटन में विवाहोत्सव में उपस्थित पश्चिमी और उत्तरी भारत के राजाओं ने भाटी राजपूतों को उत्तर और उत्तर-पश्चिम से मुसलमानों के आक्रमणों को रोकने का दायित्व सौंपा और उन्हें "उत्तर भड़किवाड़ भाटी" के सम्बोधन से सुशोभित किया। भाटी राजपूत प्रायः राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, उत्तरप्रदेश, तथा बिहार के कुछ क्षेत्रों में पाये जाते है। राजस्थान ––––बाड़मेर, जोधपुर, चित्तोड़, बीकानेर, गंगानगर, जिलों में पाये जाते है l
हिमाचल प्रदेश
-------- जुब्बल, बालसन, थियोगर, कलसी में भी भाटी वंशी राजपूत बसे है।
बिहार --मूंगेर, भागलपुर जिलों में भी यदुवंशी भाटी राजपूत पाये जाते है।
उत्तरप्रदेश-गाजियावाद, गौतमबुद्धनगर, बुलहंदशहर, ककराला (बदायूं) 'यहियापुर (प्रतापगढ़), भरगैं (एटा)
पंजाब में –––––– भटिंडा, नाभा, जींद, पटियाला, अंबाला, सिरमौर तक की यह पेटी भाटी वंश से ही है।
गुजरात --कच्छ और जामनगर में भी भाटी राजपूत पाये जाते है जो सन् 1800 के आस पास ईडर 'जोधपुर से माइग्रेट हुये थे। जय हिन्द। जय यदुवंश। जय श्री कृष्णा।
१ दस चन्द्रवंश २ दस सूर्य वंश ३ बारह ऋषि वंश ४ चार अग्नि वंश
:: चंद्रवंशी ::
१ तुंवर २ यादव ३ यवन ४ चंदेल ५ इदु असा ६ बेही ७ तावणी ८ जामड़ा ९ गोड़ १० झाला
::सुर्यवंश ::
१ गेहलोत २ कछावा ३ शुक्रवार ४ गायक वाड़ ५ बड़गुजर ६ बनाकर ७ डाबी ८ टाक ९ रायजादा १० राठौर
:: अग्निवंश ::
१ सोलंकी २ चौहान ३ पड़िहार ४ परमार
:: ऋषि वंश ::
१ सिंगलआद २ आदपडिहार ३ ब्रह्मपांचल ४ भेटिया सीर ५ लुहावत ६ गोरखा ७ गावा ८ दीखबला ९ जनुवार १० अबतआखा ११ पैजवार १२ भुराजिया
कवि चंदबरदाई के कथनानुसार
सूर्य वन्श की शाखायें:-
१. कछवाह२. राठौड ३. मौर्य ४. सिकरवार५. सिसोदिया ६.गहलोत ७.गौर ८.गहलबार ९.रेकबार १०. बडगूजर ११. कलहश १२. कटहरिय़ा
चन्द्र वंश की शाखायें:-
१.जादौन२.भाटी३.तन्वर४ चन्देल ५ .छोंकर६.होंड७.पुण्डीर८.कटैरिया९.·´दहिया १०.वै स
अग्निवंश की शाखायें:-
१.चौहान २.सोलंकी ३.परिहार ४.पमार ५. बिष्ट
ऋषिवंश की बारह शाखायें:-
१.सेंगर२.दीक्षित३.दायमा४.गौतम५.अनवार (राजा जनक के वंशज)६.विसेन७.करछुल८.हय९.अबकू तबकू १०.कठोक्स ११.द्लेला १२.बुन्देला
भाटी वंश का इतिहास भाटियों की मान्यताएं और उनके प्रतिक का सम्पूर्ण वर्णन विस्तार से
वंश परिचय :-
चंद्र:- सर्वप्रथम इस बिंदु पर विचार किया जाना आवश्यक हे की भाटीयों की उत्पत्ति केसे हुयी ? और प्राचीन श्रोतों पर द्रष्टि डालने से ज्ञात होता हे की भाटी चंद्रवंशी है | यह तथ्य प्रमाणों से भी परिपुष्ट होता हे इसमें कोई विवाद भी नहीं हे और न किसी कल्पना का हि सहारा लिया गया है | कहने का तात्पर्य यह हे की दुसरे कुछ राजवंशो की उत्पत्ति अग्नि से मानकर उन्हें अग्निवंशी होना स्वीकार किया हे | सूर्यवंशी राठोड़ों के लिए यह लिखा मिलता हे की राठ फाड़ कर बालक को निकालने के कारन राठोड़ कहलाये | ऐसी किवदंतियों से भाटी राजवंश सर्वथा दूर है |
श्रीमदभगवत पुराण में लिखा हे चंद्रमा का जन्म अत्री ऋषि की द्रष्टि के प्रभाव से हुआ था | ब्रह्माजी ने उसे ओषधियों और नक्षत्रों का अधिपति बनाया | प्रतापी चन्द्रमा ने राजसूय यज्ञ किया और तीनो लोको पर विजयी प्राप्त की उसने बलपूर्वक ब्रहस्पति की पत्नी तारा का हरण किया जिसकी कोख से बुद्धिमान 'बुध ' का जन्म हुआ | इसी के वंश में यदु हुआ जिसके वंशज यादव कहलाये | आगे चलकर इसी वंश में राजा भाटी का जन्म हुआ | इस प्रकार चद्रमा के वंशज होने के कारन भाटी चंद्रवंशी कहलाये |
कुल परम्परा :-
यदु :- भाटी यदुवंशी है | पुराणों के अनुसार यदु का वंश परम पवित्र और मनुष्यों के समस्त पापों को नष्ट करने वाला है | इसलिए इस वंश में भगवान् श्रीकृष्णा ने जन्म लिया तथा और भी अनेक प्रख्यात नृप इस वंश में हुए |
३.कुलदेवता :-
लक्ष्मीनाथजी :- राजपूतों के अलग -अलग कुलदेवता रहे है | भाटियों ने लक्ष्मीनाथ को अपना कुलदेवता माना है |
४. कुलदेवी :-
स्वांगीयांजी :- भाटियों की कुलदेवी स्वांगयांजी ( आवड़जी ) है | उन्ही के आशीर्वाद और क्रपा से भाटियों को निरंतर सफलता मिली और घोर संघर्ष व् विपदाओं के बावजूद भी उन्हें कभी साहस नहीं खोया | उनका आत्मविश्वास बनाये रखने में देवी -शक्ति ने सहयोग दिया |
५. इष्टदेव
श्रीकृष्णा :- भाटियों के इष्टदेव भगवान् श्रीकृष्णा है | वे उनकी आराधना और पूजा करते रहे है | श्रीकृष्णा ने गीता के माध्यम से उपदेश देकर जनता का कल्याण किया था | महाभारत के युद्ध में उन्होंने पांडवों का पक्ष लेकर कोरवों को परास्त किया | इतना हि नहीं ,उन्होंने बाणासुर के पक्षधर शिवजी को परास्त कर अपनी लीला व् शक्ति का परिचय दीया | ऐसी मान्यता है की श्रीकृष्णा ने इष्ट रखने वाले भाटी को सदा सफलता मिलती है और उसका आत्मविश्वास कभी नहीं टूटता है |
६.वेद :-
यजुर्वेद :- वेद संख्या में चार है - ऋग्वेद ,यजुर्वेद ,सामवेद ,और अर्थवेद | इनमे प्रत्येक में चार भाग है - संहिता ,ब्राहण, आरण्यक और उपनिषद | संहिता में देवताओं की स्तुति के मन्त्र दिए गए हे तथा ;ब्राहण ' में ग्रंथो में मंत्रो की व्याख्या की गयी है | और उपनिषदों में दार्शनिक सिद्धांतों का विवेचन मिलता है | इनके रचयिता गृत्समद ,विश्वामित्र ,अत्री और वामदेव ऋषि थे | यह सम्पूर्ण साहित्य हजारों वर्षों तक गुरु-शिष्यपरम्परा द्वारा मौखिक रूप से ऐक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को प्राप्त होता रहा | बुद्ध काल में इसके लेखन के संकेत मिलते है परन्तु वेदों से हमें इतिहास की पूर्ण जानकारी नहीं मिलती है | इसके बाद लिखे गए पुराण हमें प्राचीन इतिहास का बोध कराते है | भाटियों ने यजुर्वेद को मान्यता दी है | स्वामी दयानंद सरस्वती यजुर्वेद का भाष्य करते हुए लिखते है '' मनुष्यों ,सब जगत की उत्पत्ति करने वाला ,सम्पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त सब सुखों के देने और सब विद्या को प्रसिद्ध करने वाला परमात्मा है |............. लोगो को चाहिए की अच्छे अच्छे कर्मों से प्रजा की रक्षा तथा उतम गुणों से पुत्रादि की सिक्षा सदेव करें की जिससे प्रबल रोग ,विध्न और चोरों का आभाव होकर प्रजा व् पुत्रादि सब सुखों को प्राप्त हो | यही श्रेष्ठ काम सब सुखों की खान है | इश्वर आज्ञा देता है की सब मनुष्यों को अपना दुष्ट स्वभाव छोड़कर विध्या और धर्म के उपदेश से ओरों को भी दुष्टता आदी अधर्म के व्यवहारों से अलग करना चाहिए | इस प्रकार यजुर्वेद ज्ञान का भंडार है | इसके चालीस अध्याय में १९७५ मंत्र है
७.गोत्र :-
अत्री :- कुछ लोग गोत्र का तात्पर्य मूल पुरुष से मानने की भूल करते है | वस्तुत गोत्र का तात्पर्य मूल पुरुष से नहीं हे बल्कि ब्राहण से है जो वेदादि शास्त्रों का अध्ययन कराता था | विवाह ,हवन इत्यादि सुभ कार्य के समय अग्नि की स्तुति करने वाला ब्राहण अपने पूर्व पुरुष को याद करता है इसलिए वह हवन में आसीन व्यक्ति को | वेड के सूक्तों से जिन्होंने आपकी स्तुति की उनका में वंशज हूँ | यदुवंशियों के लिए अत्री ऋषि ने वेदों की रचना की थी | इसलिए इनका गोत्र '' अत्री '' कहलाया |
८.छत्र :-
मेघाडम्बर :- श्री कृष्णा का विवाह कुनणपुर के राजा भीष्मक की पुत्री रुकमणी के साथ हुआ | श्रीकृष्ण जब कुनणपुर गए तब उनका सत्कार नहीं होने से वे कृतकैथ के घर रुके | उस समय इंद्र ने लवाजमा भेजा | जरासंध के अलावा सभी राजाओं ने नजराना किया | श्रीकृषण ने लवाजमा की सभी वस्तुएं पुनः लौटा दी परन्तु मेघाडम्बर छत्र रख लिया | श्रीकृष्ण ने कहा की जब तक मेघाडम्बर रहेगा यदुवंशी राजा बने रहेंगे | अब यह मेघाडम्बर छत्र जैसलमेर के राजघराने की सोभा बढ़ा रहा है |
9.ध्वज :-
भगवा पीला रंग :- पीला रंग समृदधि का सूचक रहा है और भगवा रंग पवित्र माना गया है | इसके अतिरिक्त पीले रंग का सूत्र कृष्ण भगवान के पीताम्बर से और भगवा रंग नाथों के प्रती आस्था से जुड़ा हुआ है | इसलिए भाटी वंश के ध्वज में पीले और भगवा रंग को स्थान दिया गया है |
१०.ढोल :-
भंवर :- सर्वप्रथम महादेवजी ने नृत्य के समय 14 बार ढोल बजा कर 14 महेश्वर सूत्रों का निर्माण किया था | ढोल को सब वाध्यों का शिरोमणि मानते हुए use पूजते आये है | महाभारत के समय भी ढोल का विशेष महत्व रहा है | ढोल का प्रयोग ऐक और जहाँ युद्ध के समय योद्धाओं को एकत्र करने के लिए किया जाता था वही दुसरी और विवाह इत्यादि मांगलिक अवसरों पर भी इसे बजाया जाता है | भाटियों ने अपने ढोल का नाम भंवर रखा |
११. नक्कारा :-
अग्नजोत ( अगजीत)- नक्कारा अथवा नगारा (नगाड़ा ) ढोल का हि ऐक रूप है | युद्ध के समय ढोल घोड़े पर नहीं रखा जा सकता था इसलिए इसे दो हिस्सो में विभक्त कर नगारे का स्वरूप दिया गया था | नगारा बजाकर युद्ध का श्रीगणेश किया जाता था | विशेष पराक्रम दिखाने पर राज्य की और से ठिकानेदारों को नगारा ,ढोल ,तलवार और घोडा आदी दिए जाते थे | ऐसे ठिकाने ' नगारबंद' ठिकाने कहलाते थे | घोड़े पर कसे जाने वाले नगारे को 'अस्पी' , ऊंट पर रखे जाने वाले नगारे को सुतरी' और हाथी पर रखे जाने नगारे को ' रणजीत ' कहा गया है |''
भाटियों ने अपने नगारे का नाम अग्नजोत रखा है | अर्थात ऐसा चमत्कारी नक्कारा जिसके बजने से अग्नि प्रज्वलित हो जाय | अग्नि से जहाँ ऐक और प्रकाश फैलता है और ऊर्जा मिलती है वही अग्नि दूसरी और शत्रुओं का विनाश भी करती है | कुछ रावों की बहियों में इसका नाम '' अगजीत '' मिलता है , जिसका अर्थ है पापों पर विजय पाने वाला ,नगारा |
१२.गुरु:-
रतननाथ :- नाथ सम्प्रदाय का सूत्र भाटी राजवंश के साथ जुड़ा हुआ है | ऐक और नाथ योगियों के आशीर्वाद से भाटियों का कल्याण हुआ तो दूसरी और भाटी राजवंश का पश्रय मिलने पर नाथ संप्रदाय की विकासयात्रा को विशेष बल मिला | 9वीं शताब्दी के मध्य योगी रतननाथ को देरावर के शासक देवराज भाटी को यह आशीर्वाद दिया था की भाटी शासकों का इस क्षेत्र में चिरस्थायी राज्य रहेगा | इसके बारे में यह कथा प्रचलित हे की रतननाथ ने ऐक चमत्कारी रस्कुप्पी वरीहायियों के यहाँ रखी | वरीहायियो के जमाई देवराज भाटी ने उस कुप्पी को अपने कब्जे में कर उसके चमत्कार से गढ़ का निर्माण कराया | रतननाथ को जब इस बात का पता चला तो वह देवराज के पास गए और उन्होंने उस कुप्पी के बारे में पूछताछ की | तब देवराज ने सारी बतला दी | इस पर रतननाथ बहुत खुश हुए और कहा की '' टू हमारा नाम और सिक्का आपने मस्तक पर धारण कर | तेरा बल कीर्ति दोनों बढेगी और तेरे वंशजों का यहाँ चिरस्थायी राज्य रहेगा | राजगद्दी पर आसीन होते समय तू रावल की पदवी और जोगी का भगवा ' भेष ' अवश्य धारण करना |''
भाटी शासकों ने तब से रावल की उपाधि धारण की और रतननाथ को अपना गुरु मानते हुए उनके नियमों का पालन किया |
13.पुरोहित :-
पुष्करणा ब्राहण :- भाटियों के पुरोहित पुष्पकरणा ब्राहण माने गए है | पुष्कर के पीछे ये ब्राहण पुष्पकरणा कहलाये | इनका बाहुल्य ,जोधपुर और बीकानेर में रहा है | धार्मिक अनुष्ठानो को किर्यान्वित कराने में इनका महतवपूर्ण योगदान रहता आया है |
14 पोळपात
रतनू चारण - भाटी विजयराज चुंडाला जब वराहियों के हाथ से मारा गया तो उस समय उसका प्रोहित लूणा उसके कंवर देवराज के प्राण बचाने में सफल हुए | कुंवर को लेकर वह पोकरण के पास अपने गाँव में जाकर रुके | वराहियों ने उसका पीछा करते हुए वहां आ धमके | उन्होंने जब बालक के बारे में पूछताछ की तो लूणा ने बताया की मेरा बेटा है | परन्तु वराहियों को विस्वाश नहीं हुआ | तब लूणा ने आपने बेटे रतनू को साथ में बिठाकर खाना खिलाया | इससे देवराज के प्राण बच गए परन्तु ब्राह्मणों ने रतनू को जातिच्युत कर दिया | इस पर वह सोरठ जाने को मजबूर हुआ | जब देवराज अपना राज्य हस्तगत करने में सफल हुआ तब उसने रतनू का पता लगाया और सोरठ से बुलाकर सम्मानित किया और अपना पोळपात बनाया | रतनू साख में डूंगरसी ,रतनू ,गोकल रतनू आदी कई प्रख्यात चारण हुए है |
15. नदी
यमुना :- भगवान् श्रीकृष्ण की राजधानी यमुना नदी किनारे पर रही ,इसी के कारन भाटी यमुना को पवित्र मानते है |
16.वृक्ष
पीपल और कदम्ब :- भगवान् श्री कृष्णा ने गीता के उपदेश में पीपल की गणना सर्वश्रेष्ठ वृक्षों में की है | वेसे पीपल के पेड़ की तरह प्रगतिशील व् विकासशील प्रवर्ती के रहे है | जहाँ तक कदम्ब का प्रश्न है , इसका सूत्र भगवान् श्री कृष्णा की क्रीड़ा स्थली यमुना नदी के किनारे कदम्ब के पेड़ो की घनी छाया में रही थी | इसके आलावा यह पेड़ हमेशा हर भरा रहता है इसलिए भाटियों ने इसे अंगीकार किया हे | वृहत्संहिता में लिखा है की कदम्ब की लकड़ी के पलंग पर शयन करना मंगलकारी होता है | चरक संहिता के अनुसार इसका फूल विषनीवारक् तथा कफ और वात को बढ़ाने वाला होता है | वस्तुतः अध्यात्मिक और संस्कृतिक उन्नयन में कदम्ब का जितना महत्व रहा है | उतना महत्व समस्त वनस्पतिजगत में अन्य वृक्ष का नहीं रहा है
17.राग
मांड :- जैसलमेर का क्षेत्र मांड प्रदेश के नाम से भी जाना गया है | इस क्षेत्र में विशेष राग से गीत गाये जाते है जिसे मांड -राग भी कहते है | यह मधुर राग अपने आप में अलग पहचान लिए हुए है | मूमल ,रतनराणा ,बायरीयो ,कुरंजा आदी गीत मांड राग में गाये जाने की ऐक दीर्धकालीन परम्परा रही है |
18.माला
वैजयन्ती:- भगवान् श्रीकृष्णा ने जब मुचुकंद ( इक्ष्वाकुवशी महाराजा मान्धाता का पुत्र जो गुफा में सोया हुआ था ) को दर्शन दिया , उस समय उनके रेशमी पीताम्बर धारण किया हुआ था और उनके घुटनों तक वैजयंती माला लटक रही थी | भाटियों ने इसी नाम की माला को अंगीकार किया | यह माला विजय की प्रतिक मानी जाती है |
19.विरुद
उतर भड़ किवाड़ भाटी :-सभी राजवंशो ने उल्लेखनीय कार्य सम्पादित कर अपनी विशिष्ट पहचान बनायीं और उसी के अनुरूप उन्हें विरुद प्राप्त हुआ | दुसरे शब्दों में हम कह सकते हे की '; विरुद '' शब्द से उनकी शोर्य -गाथा और चारित्रिक गुणों का आभास होता है | ढोली और राव भाट जब ठिकानों में उपस्थित होते है , तो वे उस वंश के पूर्वजों की वंशावली का उद्घोष करते हुए उन्हें विरुद सुनते है
भाटियों ने उतर दिशा से भारत पर आक्रमण करने वाले आततायियों का सफलतापूर्ण मुकाबला किया था , अतः वे उतर भड़ किवाड़ भाटी अर्थात उतरी भारत के रक्षक कहलाये | राष्ट्रिय भावना व् गुमेज गाथाओं से मंडित यह विरुद जैसलमेर के राज्य चिन्ह पर अंकित किया गया है
२.अभिवादन
जयश्री कृष्णा :- ऐक दुसरे से मिलते समय भाटी '' जय श्री कृष्णा '' कहकर अभिवादन करते है | पत्र लिखते वक्त भी जय श्री कृष्णा मालूम हो लिखा जाता है |
21. राजचिन्ह :- राजचिन्ह का ऐतिहासिक महत्व रहा है | प्रत्येक चिन्ह के अंकन के पीछे ऐतिहासिक घटना जुडी हुयी रहती हे | जैसलमेर के राज्यचिन्ह में ऐक ढाल पर दुर्ग की बुर्ज और ऐक योद्धा की नंगी भुजा में मुदा हुआ भाला आक्रमण करते हुए दर्शाया गया है | श्री कृष्णा के समय मगध के राजा जरासंघ के पास चमत्कारी भाला था | यादवों ने जरासंघ का गर्व तोड़ने के लिए देवी स्वांगियाजी का प्रतिक माना गया है | ढाल के दोनों हिरण दर्शाए गए है जो चंद्रमा के वाहन है | नीचे '' छ्त्राला यादवपती '' और उतर भड़ किवाड़ भाटी अंकित है | जैसलमेर -नरेशों के राजतिलक के समय याचक चारणों को छत्र का दान दिया जाता रहा है इसलिए याचक उन्हें '' छ्त्राला यादव '' कहते है | इस प्रकार राज्यचिन्ह के ये सूत्र भाटियों के गौरव और उनकी आस्थाओं के प्रतिक रहे है |
22.भट्टीक सम्वत :- भट्टीक सम्वत भाटी राजवंश की गौरव -गरिमा ,उनके दीर्धकालीन वर्चस्व और प्रतिभा का परिचयाक है | वैसे चौहान ,प्रतिहार ,पंवार ,गहलोत ,राठोड़ और कछवाह आदी राजवंशों का इतिहास भी गौरवमय रहा है परन्तु इनमे से किसी ने अपने नाम से सम्वत नहीं चलाया | भाटी राजवंश द्वारा कालगणना के लिए अलग से अपना संवत चलाना उनके वैभव का प्रतिक है | उनके अतीत की यह विशिष्ट पहचान शिलालेखों में वर्षों तक उत्कीर्ण होती रही है |
भाटियों के मूल पुरुष भाटी थे | इस बिंदु पर ध्यान केन्द्रित करते हुए ओझा और दसरथ शर्मा ने आदी विद्वानों ने राजा भाटी द्वारा विक्रमी संवत ६८०-81 में भट्टीक संवत आरम्भ किये जाने का अनुमान लगाया है | परन्तु भाटी से लेकर १०७५ ई. के पूर्व तक प्रकाश में आये शिलालेख में भट्टीक संवत का उल्लेख नहीं है | यदि राजा भाटी इस संवत का पर्वर्तक होते तो उसके बाद के राजा आपने शिलालेखों में इसका उल्लेख जरुर करते |
भट्टीक संवत का प्राचीनतम उल्लेख देरावर के पास चत्रेल जलाशय पर लगे हुए स्तम्भ लेख में हुआ है जो भट्टीक संवत ४५२ ( १०७५ ई= वि.सं.११३२) है इसके बाद में कई शिलेखों प्रकाश में आये जिनके आधार पर कहा जा सकता है की भट्टीक सम्वत का उल्लेख करीब 250 वर्ष तक होता रहा |
खोजे गए शिलालेखों के आधार पर यह तथ्य भी उजागर हुआ हे की भट्टीक सम्वत के साथ साथ वि. सं. का प्रयोग भी वि. सं,. १४१८ से होने लगा | इसके बाद के शिलालेखों में वि. सं, संवत के साथ साथ भट्टीक संवत का भी उल्लेख कहीं कहीं पर मिलता है अब तक प्राप्त शिलालेखों में अंतिम उल्लेख वि. सं. १७५६ ( भट्टीक संवत १०७८ ) अमरसागर के शिलालेख में हुआ है | ऐसा प्रतीत होता है की परवर्ती शासकों ने भाटियों के मूल पुरुष राजा भाटी के नाम से भट्टीक संवत का आरम्भ किया गया | कालगणना के अनुसार राजा भाटी का समय वि. संवत ६८० में स्थिर कर उस समय से हि भट्टीक संवत १ का प्रारंभ माना गया है और उसकी प्राचीनता को सिद्ध करने के लिए भट्टीक संवत का उल्लेख कुंवर मंगलराव और दुसज तथा परवर्ती शासकों ने शिलालेखों में करवाया | बाद में वि.सं. और भट्टीक संवत के अंतर दर्शाने के लिए दोनों संवतों का प्रयोग शिलालेखों में होने लगा |
एंथोनी ने विभिन्न क्षेत्रों का भ्रमण कर भट्टीक संवत आदी शिलालेखों कि खोज की है | उसके अनुसार अभी तक २३१ शिलालेख भट्टीक संवत के मिले है जिसमे १७३ शिलालेखों में सप्ताह का दिन ,तिथि ,नक्षत्र ,योग आदी पर्याप्त जानकारियां मिली है | भट्टीक संवत ७४० और ८९९ के शिलालेखों में सूर्य राशियों स्पष्ट रूप से देखि जा सकती है | यह तथ्य भी उजागर हुआ है की मार्गशीर्ष सुदी १ से नया वर्ष और अमावस्या के बाद नया महिना प्रारंभ होता है | भट्टीक सम्वत का अधिकतम प्रयोग ५०२-600 अर्थात ११२४-१२२४ ई. के दोरान हुआ जिसमे 103 शिलालेख है जबकि १२२४-१३५२ ई. के मध्य केवल 66 शिलालेख प्राप्त हुए है | १२२२ से १२५० ई और ११३३४ से १३५२ के मध्य कोई शिलालेख नहीं मिलता है | जहाँ तह सप्ताह के दिनों का महत्व का प्रसन्न है ११२४- १२२२ के शिलालेखों में रविवार की आवृति बहुत अधिक है परन्तु इसके बाद गुरुवार और सोमवार का अधिक प्रयोग हुआ है | मंगलवार और शनिवार का प्रयोग न्यून है
भाटियो का राव वंश वेलियो ,सोरम घाट ,आत्रेस गोत्र ,मारधनी साखा ,सामवेद ,गुरु प्रोहित ,माग्न्यार डगा ,रतनु चारण तीन परवर ,अरनियो ,अपबनो ,अगोतरो ,मथुरा क्षेत्र ,द्वारका कुल क्षेत्र ,कदम वृक्ष ,भेरव ढोल ,गनादि गुणेश ,भगवां निशान ,भगवी गादी ,भगवी जाजम ,भगवा तम्बू ,मृगराज ,सर घोड़ों अगनजीत खांडो ,अगनजीत नगारों ,यमुना नदी ,गोरो भेरू ,पक्षी गरुड़ ,पुष्पकर्णा पुरोहित ,कुलदेवी स्वांगीयाजी ,अवतार श्री कृष्णा ,छत्र मेघाडंबर ,गुरु दुर्वासा रतननाथ ,विरूप उतर भड किवाड़ ,छ्त्राला यादव ,अभिवादन जय श्री कृष्णा ,व्रत एकादशी ।
::छतीस वंश ::१ दस चन्द्रवंश २ दस सूर्य वंश ३ बारह ऋषि वंश ४ चार अग्नि वंश
:: चंद्रवंशी ::
१ तुंवर २ यादव ३ यवन ४ चंदेल ५ इदु असा ६ बेही ७ तावणी ८ जामड़ा ९ गोड़ १० झाला
::सुर्यवंश ::
१ गेहलोत २ कछावा ३ शुक्रवार ४ गायक वाड़ ५ बड़गुजर ६ बनाकर ७ डाबी ८ टाक ९ रायजादा १० राठौर
:: अग्निवंश ::
१ सोलंकी २ चौहान ३ पड़िहार ४ परमार
:: ऋषि वंश ::
१ सिंगलआद २ आदपडिहार ३ ब्रह्मपांचल ४ भेटिया सीर ५ लुहावत ६ गोरखा ७ गावा ८ दीखबला ९ जनुवार १० अबतआखा ११ पैजवार १२ भुराजिया
कवि चंदबरदाई के कथनानुसार
सूर्य वन्श की शाखायें:-
१. कछवाह२. राठौड ३. मौर्य ४. सिकरवार५. सिसोदिया ६.गहलोत ७.गौर ८.गहलबार ९.रेकबार १०. बडगूजर ११. कलहश १२. कटहरिय़ा
चन्द्र वंश की शाखायें:-
१.जादौन२.भाटी३.तन्वर४ चन्देल ५ .छोंकर६.होंड७.पुण्डीर८.कटैरिया९.·´दहिया १०.वै स
अग्निवंश की शाखायें:-
१.चौहान २.सोलंकी ३.परिहार ४.पमार ५. बिष्ट
ऋषिवंश की बारह शाखायें:-
१.सेंगर२.दीक्षित३.दायमा४.गौतम५.अनवार (राजा जनक के वंशज)६.विसेन७.करछुल८.हय९.अबकू तबकू १०.कठोक्स ११.द्लेला १२.बुन्देला




Bhai ku ullu bna rhe ho yar ... Rajput kab Gujar se nikalne lge .. faltu me....
ReplyDeleteShi kaha bhai
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