चौहान वंश

चौहान वंश 
चौहान या चव्हाण भारत की एक प्रसिद्ध जाति है जो राजपूतों में आता है। विद्वानों का कहना है कि चौहान मूल से राजपूत थे तथा १० वी शताब्दी तक गुर्जर/गुर्जरात्रा प्रदेष (गुजरात) राजपूत राजवंश प्रतिहारो के अधीन थे। साम्भर झील और पुष्कर, आमेर और वर्तमान जयपुर, राजस्थान में भी होते थे, जो अब सारे उत्तर भारत में फैले हुए हैं। इसके अलावा मैनपुरी उत्तर प्रदेश एवं नीमराना, राजस्थान के अलवर जिले में भी पाये जाते हैं। जौरवाल गोत्र के मीणा भी इनके वंशज माने जाते हैं जिनहोने तराईन के युध में पृथ्वीराज का बहुत साथ दिया था। आज में उन्ही के वंशजों में खिंवाडा़ के चौहान है। जो आज के समय मे पाली निवास करते हैं।

चह्वान (चतुर्भुज)
अग्निवंश के सम्मेलन कर्ता ऋषि
१.वत्सम ऋषि,२.भार्गव ऋषि,३.अत्रि ऋषि,४.विश्वामित्र,५.चमन ऋषि
विभिन्न ऋषियों ने प्रकट होकर अग्नि में आहुति दी तो विभिन्न चार वंशों की उत्पत्ति हुयी जो इस इस प्रकार से है-
१.पाराशर ऋषि ने प्रकट होकर आहुति दी तो परिहार की उत्पत्ति हुयी (पाराशर गोत्र)
२.वशिष्ठ ऋषि की आहुति से परमार की उत्पत्ति हुयी (वशिष्ठ गोत्र)
३.भारद्वाज ऋषि ने आहुति दी तो सोलंकी की उत्पत्ति हुयी (भारद्वाज गोत्र)
४.वत्स ऋषि ने आहुति दी तो चतुर्भुज चौहान की उत्पत्ति हुयी (वत्स गोत्र)

दोहा-
चौहान को वंश उजागर है,जिन जन्म लियो धरि के भुज चारी,
बौद्ध मतों को विनास कियो और विप्रन को दिये वेद सुचारी॥ चौहान की कई पीढियों के बाद अजय पाल जी महाराज पैदा हुये
जिन्होने आबू पर्वत छोड कर अजमेर शहर बसाया
अजमेर मे पृथ्वी तल से १५ मील ऊंचा तारागढ किला बनाया जिसकी वर्तमान में १० मील ऊंचाई है,महाराज अजयपाल जी चक्रवर्ती सम्राट हुये.
इसी में कई वंश बाद माणिकदेवजू हुये,जिन्होने सांभर झील बनवाई थी।
सांभर बिन अलोना खाय,माटी बिके यह भेद कहाय"
इनकी बहुत पीढियों के बाद माणिकदेवजू उर्फ़ लाखनदेवजू हुये
इनके चौबीस पुत्र हुये और इन्ही नामो से २४ शाखायें चलीं
चौबीस शाखायें इस प्रकार से है-

१. मुहुकर्ण जी उजपारिया या उजपालिया चौहान पृथ्वीराज का वंश
२.लालशाह उर्फ़ लालसिंह मदरेचा चौहान जो मद्रास में बसे हैं
३. हरि सिंह जी धधेडा चौहान बुन्देलखंड और सिद्धगढ में बसे है
४. सारदूलजी सोनगरा चौहान जालोर झन्डी ईसानगर मे बसे है
५. भगतराजजी निर्वाण चौहान खंडेला से बिखराव
६. अष्टपाल जी हाडा चौहान कोटा बूंदी गद्दी सरकार से सम्मानित २१ तोपों की सलामी
७.चन्द्रपाल जी भदौरिया चौहान चन्द्रवार भदौरा गांव नौगांव जिला आगरा
८.चौहिल जी चौहिल चौहान नाडौल मारवाड बिखराव हो गया
९. शूरसेन जी देवडा चौहान सिरोही (सम्मानित)
१०.सामन्त जी साचौरा चौहान सन्चौर का राज्य टूट गया
११.मौहिल जी मौहिल चौहान मोहिल गढ का राज्य टूट गया
१२.खेवराज जी उर्फ़ अंड जी वालेगा चौहान पटल गढ का राज्य टूट गया बिखराव
१३. पोहपसेन जी पवैया चौहान पवैया गढ गुजरात
१४. मानपाल जी मोरी चौहान चान्दौर गढ की गद्दी
१५. राजकुमारजी राजकुमार चौहान बालोरघाट जिला सुल्तानपुर में
१६.जसराजजी जैनवार चौहान पटना बिहार गद्दी टूट गयी
१७.सहसमल जी वालेसा चौहान मारवाड गद्दी
१८.बच्छराजजी बच्छगोत्री चौहान अवध में गद्दी टूटगयी.
१९.चन्द्रराजजी चन्द्राणा चौहान अब यह कुल खत्म हो गया है
२०. खनगराजजी कायमखानी चौहान झुन्झुनू मे है लेकिन गद्दी टूट गयी है,मुसलमान बन गये है
२१. हर्राजजी जावला चौहान जोहरगढ की गद्दी थे लेकिन टूट गयी.
२२.धुजपाल जी गोखा चौहान गढददरेश मे जाकर रहे.
२३.किल्लनजी किशाना चौहान किशाना गोत्र के गूजर हुये जो बांदनवाडा अजमेर मे है
२४.कनकपाल जी कटैया चौहान सिद्धगढ मे गद्दी (पंजाब)

उपरोक्त प्रशाखाओं में अब करीब १२५ हैं

बाद में आनादेवजू पैदा हुये
आनादेवजू के सूरसेन जी और दत्तकदेवजू पैदा हुये
सूरसेन जी के ढोडेदेवजी हुये जो ढूढाड प्रान्त में था,यह नरमांस भक्षी भी थे.
ढोडेदेवजी के चौरंगी-—सोमेश्वरजी--—कान्हदेवजी हुये

सोम्श्वरजी को चन्द्रवंश में उत्पन्न अनंगपाल की पुत्री कमला ब्याही गयीं थीं

सोमेश्वरजी के पृथ्वीराजजी हुये
पृथ्वीराजजी के-
रेनसी कुमार जो कन्नौज की लडाई मे मारे गये
अक्षयकुमारजी जो महमूदगजनवी के साथ लडाई मे मारे गये
बलभद्र जी गजनी की लडाई में मारे गये
इन्द्रसी कुमार जो चन्गेज खां की लडाई में मारे गये

पृथ्वीराज ने अपने चाचा कान्हादेवजी का लडका गोद लिया जिसका नाम राव हम्मीरदेवजू था
हम्मीरदेवजू के-दो पुत्र हुये रावरतन जी और खानवालेसी जी
रावरतन सिंह जी ने नौ विवाह किये थे और जिनके अठारह संताने थीं,
सत्रह पुत्र मारे गये
एक पुत्र चन्द्रसेनजी रहे
चार पुत्र बांदियों के रहे

खानवालेसी जी हुये जो नेपाल चले गये और सिसौदिया चौहान कहलाये.

रावरतन देवजी के पुत्र संकट देवजी हुये
संकटदेव जी के छ: पुत्र हुये
१. धिराज जू जो रिजोर एटा में जाकर बसे इन्हे राजा रामपुर की लडकी ब्याही गयी थी
२. रणसुम्मेरदेवजी जो इटावा खास में जाकर बसे और बाद में प्रतापनेर में बसे
३. प्रतापरुद्रजी जो मैनपुरी में बसे
४. चन्द्रसेन जी जो चकरनकर में जाकर बसे
५. चन्द्रशेव जी जो चन्द्रकोणा आसाम में जाकर बसे इनकी आगे की संतति में सबल सिंह चौहान हुये जिन्होने महाभारत पुराण की टीका लिखी.

मैनपुरी में बसे राजा प्रतापरुद्रजी के दो पुत्र हुये
१.राजा विरसिंह जू देव जो मैनपुरी में बसे
२. धारक देवजू जो पतारा क्षेत्र मे जाकर बसे

मैनपुरी के राजा विरसिंह जू देव के चार पुत्र हुये
१. महाराजा धीरशाह जी इनसे मैनपुरी के आसपास के गांव बसे
२.राव गणेशजी जो एटा में गंज डुडवारा में जाकर बसे इनके २७ गांव पटियाली आदि हैं
३. कुंअर अशोकमल जी के गांव उझैया अशोकपुर फ़कीरपुर आदि हैं
४.पूर्णमल जी जिनके सौरिख सकरावा जसमेडी आदि गांव हैं

महाराजा धीरशाह जी के तीन पुत्र हुये
१. भाव सिंह जी जो मैनपुरी में बसे
२. भारतीचन्द जी जिनके नोनेर कांकन सकरा उमरैन दौलतपुर आदि गांव बसे
२. खानदेवजू जिनके सतनी नगलाजुला पंचवटी के गांव हैं

खानदेव जी के भाव सिंह जी हुये
भावसिंह जी के देवराज जी हुये
देवराज जी के धर्मांगद जी हुये
धर्मांगद जी के तीन पुत्र हुये
१. जगतमल जी जो मैनपुरी मे बसे
२. कीरत सिंह जी जिनकी संतति किशनी के आसपास है
३. पहाड सिंह जी जो सिमरई सहारा औरन्ध आदि गावों के आसपास हैं
भारती चंद जी के वंशज जिनको रायबरेली के पास गद्दी मिली । जो नोनेर से जाकर वही बस गए जिनके मुख्य गांव लालूपुर और पूरे विन्ध्यासिंह है।
लालूपुर में अखिलेश प्रताप सिंह जो वहाँ के विधायक रहे बाद में 2017 में उनकी पुत्री ने उनकी गद्दी को संभाला।
विन्ध्यासिंह से रामेश्वर चौहान के दो पुत्र मोहन और जगमोहन जाकर करौंदी बाराबंकी में बसे और जगमोहन के बडे पुत्र चंद्रभान गुरुग्राम हरियाणा में बस गए जिनके पुत्र आकर्षित चौहान है।


चौहान वंश( chauhan vansh) का इतिहास:-

चौहान वंश के चिह्न इस प्रकार हैं
वंश- अग्निवंश। गोत्र- वत्स । प्रवर-5 ( पाँच ) ओवर्य,च्यवन,भार्गव,जामदन्यि, अप्नुवान। वेद- सामवेद ।  शाखा -कोयुमी। सूत्र- गोभिल ग्रह। कुलदेवी-आशापूरा ।  गुरु- वशिष्ठ । ऋषि- शाडिल्म। निशान-पीला । तीर्थ- भृगुक्षेत्र।  नदी- चन्द्रभागा । इष्ट -अचलेश्वर महादेव । कुलदेवता- श्रीकृष्णजी। शस्त्र- तलवार, ध्वजा पर गरुड़ का चिह्न । गद्दी-प्रथम अजमेर, द्वितीय- दिल्ली है ।

चौहान वंश की उत्पत्ती:-

पवित्र अग्निकुल से उत्पन्न हुई शाखाओं में चौहान शाखा ही विशेष बलवान हुई है । इस वीर कुल की उत्पत्ति अग्निकुण्ड से है । यानी सबसे अन्त में विष्णु भगवान ने दुर्वा दल की बनी हुई पुतली को अग्निकुण्ड में मन उच्चारण कर डाल दिया। उसके अवयव स्वरूप चार हाथ युक्त अस्त्रधारी एक वीर पुरुष प्रगट हुआ । चार हाय होने से उसका नाम ‘‘चतुर्रज” चौहान हुआ । समस्त देवताओं ने उसे आशीर्वाद देकर ‘मेहकावती’’ नगरी का राज्य दिया। जो इस समय ‘गढ़ मण्डला’ नाम से विख्यात है । द्वापर में यह मेहकावती नाम से विख्यात थी। इस प्रसिद्ध राजकुल की शाखाओं ने भी अपने मूलवंश का गौरव बढ़ाकर चौहान नाम को सार्थक किया था। इस कुल की शाखाओं में हाड़ा, खीची, देवड़ा, और अनेक शाखा विशेष प्रसिद्ध हैं । इन शाखाओं की वीरता, प्रतिष्ठा और गौरव का वृत्तान्त (हाल) आजकल भट्ट कवियों के मधुर काव्यों में सुनहरी अक्षरों में लिखा हुआ है । चौहानों की २४ शाख में हैं
चौहान rajput वंश की शाखा:-
1. चौहान:- साचोरा, मैनपुरी में बरगइया शाखा प्रसिद्ध हुई है ।
2. हाड़ा:- बूंदी और कोटा का राजवंश जो हाड़ोती नाम से प्रसिद्ध है ।
3. खीची:- राधोगढ़ - लखनऊ में खीची से निकुम्भ और भदौरिया शाखा हुई हैं । भदौरिया ग्वालियर स्टेट और अन्य प्रदेशों में भी पाये जाते हैं. जिला आगरा में भदौरिया वंश कौ 'भदावर' ' नाम को एक रियासत है। खीची वंश में दुर्ग सिंह नाम का पुरुष हुआ था, जिसमें दरक” नाम की एक शाखा स्थापित हुई थी। मध्यभारत में खीची वंश की खिलचीपुर नाम की रियासत है ।
4. सोनगिर यथा सोनगड़े —मंगलौर के जालौर । इसकी शाखायें हेड़ा और सेनी हैं ।
5. देवड़ा (देवट) सिरोही के,
6. पाविया-पावगढ़ के नाम से
7. संचोरा
8. गायलवाल (गोलवाल),
9. निर्वाण
10. मलानी,
11. पुविया,
12. सूरा,
13. नादडेचा,
14. सक्रेचा,
15. भुरेचा
16. बालेचा-बालेस नाम से, एक नगर बसाया था,
17. तस्सेरा
18. चाचेरा
19.रोसिया
20. चांस, चांदा नामा, चांदनो, लोदरगढ़,
21.भांवर
22. वंकट
23 मोपले
24 धनारिया।
(क्षत्रिय वर्तमान पृष्ठ ११८-११६)

चौहानों Rajputo की वंशावली :-

अनल अथवा अग्निपाल -चौहानों के आादि पुरुष जो विक्रमादित्य से ६५० वर्ष पूर्व अग्निकुण्ड से पैदा हुए थे।उन्होंने तुर्क लोगों को जीतकर मैहकावती में राजधानी स्थापित की थी। फिर कोकण असीर और गोलकुण्डा को विजय किया था । अनल का पुत्र सुबाहु और मालन—इसके वंशज “मालन" चौहान कहे जाते हैं । मालन के गलनसूर, गलनसूर के अजय पाल। इन्होंने अजमेर नगर बसाया था। अजयपाल के दूलाराय सत्र ६८५ में मुसलमानों द्वारा मारे गये और उनका राज्य अजमेर मुसलमानों के अधिकार में चला गया । दूलाराय के मानिकराय-इन्होंने सांभर में चौहानों को
राजधानी स्थापित करके ‘‘सम्भरी राव' की उपाधि धारण की थी। उस समय से चौहान ‘‘सम्भरी राव' कहे जाते हैं। मैनपुरी के चौहानों की शाखा वरगईया से भैसौलिया प्रशाखा सील गांव के नाम नामानुसार हुई है ।

माणिकराय के पुत्र हर्ष राजवीरवीलन, बीसलदेव, सारंगदेव, जो छोटी अवस्था में ही मर गये थे । सारंगदेव के आना—इन्होंने अजमेर में अपने नाम से आना सागर झील बनवायी थी, जो कि अब तक प्रसिद्ध है। आना के पुत्र जयपाल और हर्षपाल थे। जयपाल के पुत्र अजयदेव या ( आनन्द देव ) विजयदेव,उदयदेव । आनन्द देव के पुत्र सोमेश्वर, कान्हाय, जैत (गोलबास) गोयलवाल। सोमेश्वर के पुत्र-पृथ्वीराज और चौहड़देव। कान्हराव के पुत्र ईश्वरी दास। पृथ्वीराज के पुत्र रैन सो। चौहड़देव के पुत्र विजय देवराज। विजयदेवराज के पुत्र लखनसी। उत्तरी चौहानों के राज वंश का आादि पुरुष मानिक राव को समझना चाहिये । उसने दूसरी बार अजमेर जीता था। उसको अधिकतर सन्तान रजवाड़े के पश्चिम में बहुत से वंशों की मानी जाती है। जिसके मनुष्य सिंध नदी तक पाये जाते
हैं । खीची, हाड़ा, मोहल, निर्वानभदौरिया, मोरीचा, धनेरियां, बाग रीचा सब चौहानों की शाखा हैं । इनका राज्य
अभी तक ‘भदावर’ ( रियासत ) में है । जो कि यमुना व ग्वालियर व भिण्ड से लगा हुआ है । जिसके कि वर्तमान राजा श्री महाराजां रिपुदमनसिंह हैं । इनके ही पूर्वजों द्वारा प्रसिद्ध मेला बटेश्वर का आरम्भ कराया गया था।

चौहान वंश का इतिहास एवं वंशावली
साभार: जय राजपुताना 
     जय भवानी हुकुम, हम अपने इस ब्लॉग में हम राजपुताना इतिहास के बिषय में चर्चा कर रहे हैं। उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए आज हम बात करने जा रहे चौहान वंश के बारे में आज हम आपको विस्तार पूर्वक चौहान वंश के इतिहास एवम गौरव के विषय में बताएंगे। चौहान वंश या उपनाम का संबंध राजपूत समाज से है। राजपूत समाज में चौहान वंश का काफी महत्व है।चौहान वंश या जाति के लोग हिंदुस्तान में रहते हैं। चौहान वंश के लोगों की यूपी और राजस्थान के कुछ हिस्सों में अच्छी खासी संख्या है।
चौहान वंश का इतिहास
• चौहान वंश की उत्पत्ति को लेकर एक कथा प्रचलित है जिसके अनुसार जब ब्राह्मणों ने राक्षसों के आतंक से परेशान होकर यज्ञ किया । उस यज्ञ की अग्नि से जो योद्धा उत्पन्न हुआ उसे ब्राह्मणों ने चौहान नाम का नाम दिया इन योद्धाओं ने राक्षसों के साथ युद्ध किया और विजय प्राप्त की जिसके बाद चौहान वंश का नाम इन्हीं चौहान योद्धाओं के नाम पर पड़ा।
• चौहान जाति या चौहान वंश को राजपूत समाज की महत्वपूर्ण जातियों में मुख्य स्थान प्राप्त है। चौहान वंश के शासकों का भारतीय इतिहास में काफी योगदान है। प्रथ्वीराज चौहान को चौहान वंश के सबसे सफल शासक के तौर पर देखा जाता है।
• चौहान वंश का गोत्र वत्स है। इसके पीछे मुख्य कारण यह है की जब राक्षसों से तंग आकर ऋषि मुनियों ने यज्ञ किया । जिसमें तमाम ऋषियों ने आहुतियाँ दी उन्हीं में से वत्स (वत्सम) ऋषि ने जब आहुति दी तो चतुर्भुज चौहान की उत्पत्ति हुयी। और वत्स ऋषि के नाम पर गोत्र का नाम वत्स पड़ा।
• चौहान वंश का उत्पत्ति स्थान आबू शिखर को माना जाता है। इसका आधार ऋषियों द्वारा किये यज्ञ स्थल को मानकर कहा गया है । आबू पर्वत पर हुए इसी यज्ञ की आहुति से चौहान वंश की उत्पत्ति हुई थी।
• चौहान वंश की कई पीढियां आबू शिखर पर ही निवास करती रहीं। इसके बाद राजा अजयपाल जी का जन्म हुआ ये पहले ऐसे चौहान शासक थे जिन्होंने आबू शिखर को छोड़कर अजमेर शहर को बसाया। श्री अजयपाल जी की पहचान एक चक्रवर्ती सम्राट के तौर पर की जाती है उनके द्वारा ही तारागढ़ किले का निर्माण कराया गया।
• आज भी अजमेर के अलावा जिस जगह पर सबसे ज्यादा चौहान वंश के लोग हैं वह है उत्तर प्रदेश का जिला मैनपुरी। मैनपुरी को महाराजा तेज सिंह की नगरी के तौर पर जाना जाता है ।मैनपुरी में बसे पहले राजा प्रतापरुद्र जी थे।
• मैनपुरी के शासक राजा प्रतापरुद्र जी के दो पुत्र थे। जिनमें से पहले राजा वीर सिंह जू देव जी जो मैनपुरी में बसे वही उनके दूसरे पुत्र धारक देवजू ने पतारा क्षेत्र की कमान संभाली।इनके पुत्र मैनपुरी जिला के कई गाँव में बस गए जिनमें से नगला जुला पंचवटी क्षेत्र,नौनेर ,कांकन, सकरा उमरैन और दौलतपुर मुख्य है।
• मैनपुरी जिला में आज भी महाराजा तेज सिंह 'जू देव' जी का किला मौजूद है । इसके अलावा ईशन नदी तिराहे पर बनी महाराजा तेज सिंह की मूर्ति आज भी मैनपुरी की शान बढा रही है।
• जहां तक चौहान वंश के स्थापना का मामला है ऐसा माना जाता है कि चौहान वंश की स्थापना वासुदेव चौहान जी ने 550 ई• के लगभग की गयी थी।
• चौहान वंश की कुलदेवी माँ आशापुरा जी है। माँ आशापुरा के मंदिर पूरे भारत में मौजूद हैं। जिनमें से ज्यादातर मंदिर राजस्थान में मौजूद है। जिनमें से नाडोल शहर (जिला पाली) और डुंगरपुर, राजस्थान के मंदिर बेहद प्रसिद्ध हैं।

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