वे महाराणा प्रताप के पुत्र तथा महाराणा उदयसिंह के पौत्र थे। राणा अमर सिंह भी महाराणा प्रताप जैसे वीर थे। इन्होंने मुगलों से 18 बार युद्ध लड़ा और हर बार उन्हें धुल चटवाई। उन्होंने जहांगीर के द्वारा करवाये गयें कई आक्रमण विफल किये। जहाँगीर मेवाड़ की विफलताओं से परेशान होकर बंगाल की और बढ़ गया जिससे अकबर उससे बहुत नाराज हुआ और उसकी जगह खुरम को बादशाह बनाने को तैयार हो गया लेकिन जल्द ही अकबर की मर्त्यु के बाद जहाँगीर बादशाह बनता है और वह मेवाड़ पर अपनी खीज निकलता है.....
महाराणा अमरसिंह अपने पिता जैसे ही वीर थे। बरसों तक लगातार लड़ाइयां लड़ते लड़ते विश्वस्त राजपूत सरदार दिन प्रतिदिन कम होते गये और अपने सरदारों की इच्छा और उस समय की स्थिति देख कर उनको अपनी आंतरिक इच्छा के विरुद्ध बादशाह जहाँगीर से सुलह करनी पड़ी, यह संधि सम्मानजनक थी जिसके तहत मेवाड़ के किसी राजा को दिल्ली के किसी बादशाह के दरबार में जाकर सलाम करने या खड़ा रहने का अपमान सहना नहीं पड़ा पर फिर भी महाराणा को बड़ा ही दुःख हुआ। इसी कारण वह राज कार्य अपने पुत्र कर्ण सिंह को सौप कर एकांतवास में रहने चले गए। महाराणा अमरसिंह ने अपने पिता महाराणा प्रताप से भी अधिक लड़ाईयां लड़ी, परन्तु बादशाह से सुलह करने के कारण ही उनकी ख्याति भारत में वैसी नहीं हुई, जैसी कि उनके पिता की है।


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